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यशपाल की सम्पूर्ण कहानियाँ - भाग 4

यशपाल

प्रकाशक : लोकभारती प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2000
पृष्ठ :309
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2356
आईएसबीएन :00000

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यशपाल की सम्पूर्ण कहानियों का चौथा भाग.....

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Yaspal ki sampurnya kahaniyan -4OK

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रस्तुत खण्ड के प्रथम संकलन ‘सच बोलने की भूल’ की भूमिका में यशपाल कहानी विधा पर अपने विचार व्यक्त करते हैं, ‘मेरी धारणा रही है कि कहानी की कला दृष्टान्त का उपयोग चाहे बहुत संक्षेप अथवा संकेत मात्र से ही हो परन्तु कहानी का मेरूदण्ड दृष्टान्त ही होता है।

कहानी कथा के सम्बध में उनकी यह स्पष्टीकरण उनकी अधिकांश का प्रेरणा स्रोत है। वे विचारों की अभिव्यक्त में ही कथा-रचना का महत्व देखने लगते हैं। एक तरह से देखें तो कहानी के संबंध में उनकी धारणा प्राचीन कथा की धारणा के समीप पहुँच जाती है, जब कहानी का उपयोग नीति-शिक्षा के लिए होता था, लेकिन यशपाल उसे समाजिक परिवर्तन के अपने वैचारिक उद्देश्यों के लिए करते हैं और मनुष्य के सहज, स्वाभाविक तर्कपूर्ण बौद्धिक जीवन के विकास का माध्यम बना देते हैं।

प्रकाशकीय

हिन्दी कहानी की विकास परम्परा में वस्तु और शिल्प दोनों दृष्टियों से यशपाल की कहानियों के वैशिष्ट्य के लिए आज भी कोई चुनौती नहीं है। वे अपनी तरह के अकेले सर्जक हैं जिनका समस्त साहित्य जनता के लिए समर्पित है। उनकी मान्यता भी यही थी कि सामाजिक विकास की निस्तरता से उत्पन्न वास्तविकताओं को अनावृत्त और विश्लेषित करते रहने से श्रेष्ठतर दूसरा मन्तव्य साहित्य का नहीं हो सकता। 1939 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘‘पिंजड़े की उड़ान’’ प्रकाश में आया तब यशपाल जीवनानुभवों के मार्ग का एक पूरा घटना बहुल सफर तय कर चुके थे।

 वैचरिक प्रयोगों की सफलता-असफलता से जूझते हुए, वहाँ पहुँच चुके थे जिसके आगे शायद मार्ग अवरुद्ध था। 1919 में रौलेट एक्ट का प्रभाव उन पर पहला माना गया है। तब तक वे अपनी पारिवारिक आर्य समाजी परम्परा के साथ जुड़े हुए थे और ट्यूशन करके परिवार की आर्थिक स्थित में अपना अंशदान देने लगे थे। फिरोजपुर छावनी में उस समय भी काँग्रेसी आन्दोलन चला उसमें यशपाल की सक्रिय भूमिका का उल्लेख किया जाता है। इतना ही नहीं 1921 में चौरी-चौरा काण्ड के बाद गाँधी जी द्वारा आन्दोलन की वापसी से देश के अनेक नौजवानों की तरह यशपाल को भी भारी निराशा हुई। वे सराकरी कालेज में पढ़ना नहीं चाहते थे। इसी कारण लालालाजपत राय के नेशनल कालेज में भर्ती हो गए। यहीं उनका परिचय भगत सिंह, सुखदेव और भगवतीचरण से हुआ। जिन्होंने देश की स्वतन्त्रता के लिए गाँधीवाद मार्ग से अलग क्रान्तिकारी रास्ते पर चलकर स्वतन्त्रता के निमित्त अपना जीवन अर्पित करने का निश्चय लिया था। वे लोग तो कुछ ही दिन बाद भूमिगत हो गए लेकिन यशपाल नेशनल कालेज में पढ़ाते हुए दल सूत्र संभालने लगे।

भगत सिंह और यशपाल दोनों की साहित्य में गहरी दिलचस्पी थी। उदयशंकर भट्ट उसी कालजे में अध्यापक थे। और उन्हीं की प्रेरणा से यशपाल की पहली कहानी हिन्दी के मासिक पत्र में प्रकाशित हुई। कानपुर के ‘प्रताप’ ने भी उनकी कुछ भावात्मक गद्य की तरह की रचनाएँ छापीं लेकिन इसे यशपाल के लेखकीय जीवन की शुरुआत मानना भूल होगी। वे तो दिन पर दिन क्रान्तिकारी आन्दोलन की भारी जिम्मेदारियों में व्यस्त होते जा रहे थे। जहाँ कुछ निश्चय थे और उनसे निसृत कार्यक्रमों का व्यस्तता भरा दौर था।

1928 में लाला लाजपत राय पर आक्रमण करने वाले सार्जेण्ट साण्डर्स को गोली मारी गयी। 1929 मार्च में भगत सिंह ने दिल्ली असेम्बली में बम फेंका। 1929 में लाहौर में एक बम फैक्ट्री पकड़ी गई। तनाव इतना बढ़ा कि यशपाल भूमिगत हो गये। कहते हैं 1929 में ही वायसराय की गाड़ी के नीचे क्रान्तिकारियों ने जो बम विस्फोट किया वह यशपाल के हाथों हुआ था।

जाहिर है कि यशपाल को एक लम्बे समय का भूमिगत जीवन बिताते हुए ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातन्त्र सेना’’ का काम सम्भालना पड़ा। 1931 में इस सेना के कमाण्डर इन चीफ चन्द्रशेखर आजाद को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में गोली मार दी गयी। यशपाल सेना के कमाण्डर इन चीफ बनाये गये इसी समय लाहौर षड्यन्त्र का मुकदमा चल रहा था। यशपाल उनके प्रधान अभियुक्त थे।। 1932 में यशपाल और दूसरे क्रान्तिकारी भी गिरफ्तार हो गये। उन्हें चौदह वर्ष का सख्त कारावास हुआ। 1938 में कांग्रेसी मन्त्रिमण्डाल आने पर राजनैतिक कैदियों की रिहाई हुई और यशपाल 2 मार्च 1938 को जेल से छूट गये। उन्हें लाहौर जाने की मनाही थी इसलिए लखनऊ को उन्होंने अपना निवास स्थान बना लिया। विप्लव का प्रकाश और उनके साहित्यिक जीवन के शुरुआत का यही काल है।

ध्यान देने की बात है कि ऊपर दिया गया एक विहंगम विवरण यशपाल के महान समरगाथा जैसे जीवन का मात्र एक ट्रेलर है। जिसके अन्यत्र अन्तर मार्गों में न जाने कितना कुछ ऐसा होगा, जिसमें भावात्मक और संवेदनात्मक तनावों के साथ वास्तविक अनुभवों के एक विराट संसार छिपा होगा—चरित्रों और घटनाओं की विपुलता के साथ मानवीय प्रकृति के बारीक अनुभवों के उल्टे-सीधे तन्तुओं का महाजाल फैला होगा जो उनके विशाल कहानी साहित्य में फैला हुआ है।

हमारे लिए उनके कथा-संकलनों को कुछ एक भागों में संकलित करते हुए अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा अन्ततः निश्चय यह हुआ कि 1939 से 1979 के बीच प्रकाशित उनके 18 कथा संकलनों को काल-क्रमानुसार चार भागों में बाँट कर प्रकाशित किया जाय। कथा साहित्य के मर्मज्ञ आलोचकों और विद्वानों ने भी इसी को उचित बताया। इससे उनके रचनात्मक विकास का एक सम्पूर्ण चित्र हिन्दी पाठकों को प्राप्त हो सकेगा। इन संकलनों के बारे में आपके सुझाव और सम्मति की हमें सदा प्रतीक्षा रहेगी।

-प्रकाशक


सच बोलने की भूल



शरद के आरम्भ में दफ्तर से दो मास की छुट्टी ले ली थी। स्वास्थ्य सुधार के लिए पहाड़ी प्रदेश में चला गया था। पत्नी और बेटी भी साथ थीं। बेटी की आयु तब सात वर्ष की थी। उस प्रदेश में बहुत छोटे-छोटे पड़ाव हैं। एक खच्चर किराये पर ले लिया था। असबाब खच्चर पर लाद लेते थे और तीनों हँसते-बोलते, पड़ाव-पड़ाव पैदल यात्रा कर रहे थे। रात पड़ाव की किसी दूकान पर या डाक-बँगले में बिता देते थे। कोई स्थान अधिक सुहावना लग जाता तो वहाँ दो रात ठहर जाते।

एक पड़ाव पर हम लोग डाक बंगले में ठहरे हुए थे। वह बंगला छोटी-सी पहाड़ी के पूर्वी आँचल में है। बँगले के चौकीदार ने बताया—साहब लोग आते हैं तो चोटी से सूर्यास्त का दृश्य जरूर देखते हैं। चौकीदार ने बता दिया कि बँगले के बिलकुल सामने से ही जंगलाती सड़क पहाड़ी तक जाती है।
पत्नी सुबह आठ मील पैदल चल चुकी थी। उसे संध्या फिर पैदल तीन मील चढ़ाई पर जाने और लौटने का उत्साह अनुभव न हुआ परन्तु बेटी साथ चलने के लिए मचल गई।

चौकादीर ने आश्वासन दिया—लगभग डेढ़ मील सीधी सड़क है और फिर पहाड़ी पर अच्छी साफ पगडंडी है। जंगली जानवर इधर नहीं हैं। सूर्यास्त के बाद कभी-कभी छोटी जाति के भेड़िये जंगल से निकल आते हैं। भेड़िये  भेड़-बकरी के मेमने या मुर्गियाँ उठा ले जाते हैं, आदमियों के समीप नहीं आते।
मैं बेटी को साथ लेकर सूर्यास्त से तीन घंटे पूर्व ही चोटी का ओर चल पड़ा। सावधानी के लिए टार्च साथ ले ली। पहाड़ी तक डेढ़ मील रास्ता बहुत सीधी-साफ था। चढ़ाई भी अधिक नहीं थी। पगडंडी से चोटी तक चढ़ने में भी कुछ कठिनाई नहीं हुई।

पहाड़ की चोटी पर पहुँच कर पश्चिम की ओर बर्फानी पहाड़ों को श्रृंखलाएं फैली हुई दिखाई दीं। क्षितिज पर उतरता सूर्य बरफ से ढँकी पहाड़ी की रीढ़ को छूने लगा तो ऊँची-नीची, आगे–पीछे खड़ी हिमाच्छादित पर्वत-श्रृंखलाएं अनेक इन्द्रधनुषों के समान झलमलाने लगीं। हिम के स्फटिक कणों की चादरों पर रंगों के खिलवाड़ से मन उमग-उमग उठता था। बच्ची उल्लास से किलक-किलक उठती थी।

सूर्यास्त के दृश्य का सम्मोहन बहुत प्रबल था परन्तु ध्यान भी था—रास्ता दिखाई देने योग्य प्रकाश में ही डाक बँगले को जाती जंगलाती सड़क पर पहुँच जाना उचित है। अँधेरे में असुविधा हो सकती है।
सूर्य आग की बड़ी थाली के समान लग रहा था। वह थाली बरफ की शूली पर, अपने किनारे पर खड़ी वेग से घूम रही थी। आग की थाली का शनैः-शनैः बरफ के कंगूरों की ओट में सरकते जाना बहुत ही मनोहारी लग रहा था। हिम के असम विस्तार पर प्रतिक्षण रंग बदल रहे थे। बच्ची उस दृश्य को विश्मय से मुँह खोले देख रही थी। दुलार से समझाने पर भी वह पूरे सूर्य के पहाड़ी की ओट में हो जाने से पहले लौटने के लिए तैयार नहीं हुई।

सहसा सूर्यास्त होते ही चोटी पर बरफ की श्यामल नीलिमा फैल गयी। पहाड़ी की चोटी पर अब भी प्रकाश था पर हम ज्यों-ज्यों पूर्व की ओर नीचे उतर रहे थे, अँधेरा घना होता जा रहा था। आप को भी अनुभव होगा कि पहाड़ों में सूर्यास्त का झुटपुट उजाला बहुत देर तक नहीं बना रहता। सूर्य पहाड़ की ओट में होते ही उपत्यका में सहसा अँधेरा हो जाता है।

मैं पगडंडी पर बच्ची को आगे किये पहाड़ी से उतर रहा था। अब धुँधलका हो जाने के कारण स्थान-स्थान पर कई पगडंडियाँ निकलती फटती जान पड़ती थीं। हम स्मृति के अनुभव से अपनी पगडंडी पहचानकर नीचे जिस रास्ते पर उतरे, वह डाक बँगले की पहचानी हुई जंगलाती सड़क नहीं जान पड़ी। अँधेरा हो गया था। रास्ता खोजने के लिए चोटी की ओर चढ़ते तो अँधेरा अधिक घना हो जाने और अधिक भटक जाने की आशंका थी। हम अनुमान से पूर्व की ओर जाती पगडंडी पर चल पड़े।

जंगल में घुप्प अँधेरा था। टार्च से प्रकाश का जो गोला सा पगडंडी पर बनता था, उससे कटीले झाड़ों और ठोकर से बचने के लिए तो सहायता मिल सकती थी परन्तु मार्ग नहीं ढूँढ़ा जा सकता था। चौकीदार ने अँचल में आस-पास काफी बस्ती होने का आश्वासन दिया। सोचा—समीप ही कोई बस्ती या झोंपड़ी मिल जायेगी, रास्ता पूँछ लेंगे।

हम टार्च के प्रकाश में झाड़ियों से बचते पगडंडी पर चले जा रहे थे। बीस-पचीस मिनट चलने के बाद एक हमारा रास्ता काटती हुई एक अधिक चौड़ी पगडंडी दिखाई दे गयी। सामने एक के बजाय तीन मार्ग देखकर दुविधा और घबराहट हुई, ठीक मार्ग कौन सा होगा ? अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की अपेक्षा भटकाव का ही अवसर अधिक हो गया था। घना अँधेरा, जंगल में रास्ता जान सकने का कोई उपाय नहीं था। आकाश में तारे उजले हो गये थे परन्तु मुझे तारों की स्थिति में दिशा पहचान सकने की समझ नहीं है। पूर्व दिशा दायीं ओर होने का अनुमान था इसलिए चौड़ी पगडंडी पर दायीं ओर चल दिये। आधे घंटे चलने पर एक और पगडंडी रास्ता काटती दिखाई दी समझ लिया, हम बहुत भटक गये हैं। मैंने सीधे सामने चलते जाना ही उचित समझा।

जंगल में अँधेरा बहुत घना था। उत्तरी वायु चल पड़ने से सर्दी भी काफी हो गई थी। अपनी घबराहट बच्ची से छिपाये था। बच्ची भयभीत न हो जाये, इसलिए उसे बहलाने के लिए और उसे रुकावट का अनुभव न होने देने के लिए कहानी सुनाने लगा परन्तु बहलाव थकावट को कितनी देर भुलाये रखता ! बच्ची बहुत थक गई थी। वह चल नहीं पा रही थी। कुछ समय उसे शीघ्र ही बंगले जाने का आश्वासन देकर उत्साहित किया और फिर उसे पीठ पर उठा लिया। वह मेरे कंधे के ऊपर से मेरे सामने टार्च का प्रकाश डालती जा रही थी। मैं बच्ची के बोझ और थकावट से हाँफता हुआ अज्ञात मार्ग पर, अज्ञात दिशा में चलता जा रहा था। मेरी पीठ पर बैठी बच्ची सर्दी से सिहर-सिहर उठती थी और मैं हाँफ-हाँफ कर पसीना-पसीना हो गया था। कुछ-कुछ समय बाद मैं दम लेने के लिए बच्ची को पगडंडी पर खड़ा करके घड़ी देख लेता था। अधिक रात न हो जाने के आश्वासन से कुछ साहस मिलता था।

हम अजाने जंगल के घने अंधेरे में ढाई घंटे तक चल चुके थे। मेरी घड़ी में साढ़े नौ बज गये तो मेरा मन बहुत घबराने लगा। बच्ची को कहानी सुना कर बहलाना सम्भव न रहा। वह जंगल में भटक जाने के भय से माँ को याद कर ठुसक-ठुसक कर रोने लगी। बँगले में अकेली, घबराती पत्नी के विचार ने और भी व्याकुल कर दिया। मेरी टाँगें थकावट से काँप रही थीं। सर्दी बहुत बढ़ गई थी। जंगल में वृक्ष के नीचे रात काट लेना भी सम्भव नहीं था। छोटे भेड़िये भी याद आ गये। वहाँ के लोग उन भेड़ियों से नहीं डरते थे पर छोटी बच्ची साथ होने पर भेड़िये से भेंट की आशंका से मेरा रक्त जमा जा रहा था।
हम जंगल से निकल कर खेतों में पहुँचे तो दस बज चुके थे। कुछ खेत पार कर चुके तो तारों के प्रकाश में कुछ दूरी पर झोपड़ी का आभास, मिला। झोपड़ी में प्रकाश नहीं था। बच्ची को पीठ पर उठाए फसल भरे खेतों में से झोपड़ी की ओर से बढ़ने लगा। झोपड़ी के कुत्ते ने हमारे उस ओर बढ़ने का एतराज किया। कुत्ते की क्रोध भरी ललकार से सांत्वना ही मिली। विश्वास हो गया, झोपड़ी सूनी नहीं थी।

पहाड़ों में वर्षा की अधिकता के कारण छतें ढालू बनाई जाती हैं। गरीब किसान ढालू छत के भीतर स्थान का उपयोग कर सकने के लिये अपनी झोपडिंयों को दो तल्ला कर लेते हैं। मिट्टी की दीवारें, फूस की छत और चारों ओर कांटों की ऊँची बाढ़। किसान लोग नीचे के तल्ले में अपने पशु बाँध लेते हैं और ऊपर के तल्ले में उनकी गृहस्थी रहती है।

मैं झोंपड़ी की बाढ़ के मोहरे पर पहुँचा तो कुत्ता मालिक को चेताने के लिये बहुत जोर से भौंका। झोंपड़ी का दरवाजा और खिड़की बन्द थे। मेरे कई बार पुकारने और कुत्ते के बहुत उत्तेजना से भौंकने पर झोंपड़ी के ऊपर के भाग में छोटी-सी खिड़की खुली झुँझलाहट की ललकार सुनाई दी, ‘‘कौन है इतनी रात गये कौन आया है ?’’
झोंपड़ी के भीतर अँधेरे में से आती ललकार को उत्तर दिया—‘‘मुसाफिर हूँ, रास्ता भटक गया हूँ। छोटी बच्ची साथ है। पड़ाव के डाँक बंगले पर जाना चाहता हूँ।’’
खिड़की से एक किसान ने सिर बाहर निकाला और क्रोध से फटकार दिया, ‘‘तुम शहरी हो न ! तुम आवारा लोगों को देहात में क्या काम ? चोरी-चकारी करने आये हो। भाग जाओ नहीं तो काट कर दो टुकड़े कर देंगे और कुत्ते को खिला देंगे।’’
किसान को अपनी और बच्ची की दयनीय अवस्था दिखलाने के लिये अपने ऊपर टार्च का प्रकाश डाला और विनती की—‘‘बाल-बच्चेदार गृहस्थ हूँ। चोटी का सूर्यास्त देखने गये थे, भटक गये। पड़ाव के बँगले में बच्चे की माँ हमारी प्रतीक्षा कर रही है,  

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